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hindi poetry

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उड़ती हूँ मैं हवा में बुलंद अपने हौंसले लिए पर जैसे ही ऊपर पहुँचूं कोई मेरी डोर खींचे उड़ना मेरा काम है पर डोर मेरी किसी की लगाम है कितना ऊपर पहुँचूं मैं तय करना उसका काम है मेरे ख़ुद के हौंसले ही उसके नाम है छूटी जो डोर उससे पता मेरा फिर अंजान है

शादी- इक सपना

इक सपना सजाया था बनू मैं भी दुल्हन,  ये हक़ जताया था हो प्यारा सा घर-संसार जिसमें बसे थे मेरे सपने हज़ार चली थी मैं अपने सपने सजाने घर आँगन में खुशियां महकाने दुकानदार ने लाल जोड़ा दिखाया रेशम से था जड़ा, ऐसा उसने था बतलाया मैचिंग की चूड़ियों का बॉक्स भी लाया जो झट से उसने था बनाया श्रृंगार का सामान खरीद, मैनें भी खरीददारी में हाथ बढ़ाया मेरे सपनों का वो बाज़ार  अब जुगनू सा था चमकाया तैयारी मेरी अब पूरी थी मेहन्दी लगनी ही अधूरी थी फिर आई इक ऐसी ख़बर  जिसने हम सबको किया बेसबर दूल्हे की ये माँग थी  गाड़ी चाहिये उसको दान थी सुनकर ये मैं बौखलाई ज़ल्दी से शादी रुकवाई पुलिस में उसकी रिपोर्ट कराई लालच उसको धन-दौलत का मुझसे कोई प्रेम नहीं पर सपना तो मेरा था ये  उसका कोई दोष नहीं