hindi poetry

उड़ती हूँ मैं हवा में
बुलंद अपने हौंसले लिए
पर जैसे ही ऊपर पहुँचूं
कोई मेरी डोर खींचे
उड़ना मेरा काम है
पर डोर मेरी किसी की लगाम है
कितना ऊपर पहुँचूं मैं
तय करना उसका काम है
मेरे ख़ुद के हौंसले ही उसके नाम है
छूटी जो डोर उससे
पता मेरा फिर अंजान है

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